पहलवान चाचा और मेरी जवानी

Pahalwan chacha aur meri jawani:

Hindi sex stories, antarvasna सुबह सारा काम निपटाने के बाद मै दोपहर के वक्त सोई हुई थी। दोपहर का खाना खा कर मुझे बड़ी अच्छी नींद आ रही थी तभी दरवाजे की घंटी बजी तो मैं दरवाजे की तरफ गई मैं झिल्लाते हुए दरवाजे को खोलो सामने देखा तो एक कोरियर वाला खड़ा था। उस कोरियर वाले ने मुझे कहा मैडम आपका कोरियर आया है मैंने उससे कोरियर लिया और दरवाजे को बंद कर दिया मैं कमरे में आ गई। मैंने उस कोरियार के पैकेट को खोला तो उसमें मैंने देखा कुछ दिनों पहले मैंने एक  किताब ऑनलाइन मंगवाई थी लेकिन उस किताब को फिलहाल मेरा देखने का मन नहीं हुआ मैंने उसे अपनी मेज पर रख दिया। मैं सोने की कोशिश करने लगी मेरे बगल में मेरी 4 वर्ष की बेटी भी सो रही थी मेरी नींद तो आंखों से दूर हो चुकी थी मुझे नींद नहीं आ रही थी।

मैं लेटे लेटे ही पुरानी बातें सोचने लगी मैं सोचने लगी शादी से पहले मैं कैसे अपने माता पिता के घर पर रहा करती थी और शादी के बाद अब मेरे सारे सपने जैसे चकनाचूर हो चुके हैं। मैंने शादी से पहले ना जाने क्या क्या सपने देखे थे जब मेरी शादी हुई तो मैंने सोचा था कि मैं अपने पति प्रभात के साथ घूमने के लिए पहाड़ की वादियों में जाऊंगी और हमारी कुछ यादें होंगी लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। मेरे सारे सपने चकनाचूर हो चुके थे प्रभात ने मेरे सारे सपनों को तोड़ कर रख दिया था। जब शाम के वक्त प्रभात अपने ऑफिस से लौटे तो वह मुझे कहने लगे सोनिया मुझे पानी पिला दो। मैंने फ्रिज से पानी की बोतल निकाली और प्रभात को पकड़ा दी। प्रभात ने पानी पिया और कहने लगे कितना सुकून मिल रहा है बाहर कितनी ज्यादा गर्मी हो रही है और ठंडा पानी पी कर तो ऐसा लग रहा है जैसे कि कुछ देर के लिए गर्मी से राहत मिल गई हो। रात को हम लोगों ने डिनर किया उसके बाद प्रभात मुझसे कहने लगे सोनिया आज हम लोग अपनी जिंदगी को पहले जैसा बनाने की कोशिश करेंगे। मैंने प्रभात से पूछा लगता है आज तुम्हारे मां ने तुम्हें कुछ कहा होगा। प्रभात कहने लगे सोनिया तुमसे तो बात करना ही बेकार है प्रभात गुस्से में सो चुके थे। अगले दिन वह अपने ऑफिस चले गए प्रभात स्कूल में बाबू के पद पर तैनात हैं उन्हे जब भी समय मिलता है तो वह अपने गांव अपने माता पिता से मिलने के लिए चले जाते हैं।

प्रभात अपनी मां की बात बहुत ज्यादा मानते हैं मैं कई बार सोचती हूं कि मैंने बहुत बड़ी गलती की जो प्रभात से शादी की क्योंकि वह अपनी मर्जी से कुछ कर ही नहीं सकते हैं हमेशा उनके चेहरे पर एक अजीब सा तनाव रहता है। ऑफिस से वह थके आते हैं उसके बाद खाना खा कर सो जाते हैं मेरा दिल अंदर से बहुत दुखी है मैं सिर्फ प्रभात के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रही हूं। मैं सच कहूं तो मै प्रभात के साथ अपनी जिंदगी काट रही हूं अब मुझे उनसे कोई उम्मीद भी नहीं है। प्रभात ने मेरे और अपने जीवन को पूरी तरीके से बर्बाद कर के रख दिया है यह सब उनके माता पिता की वजह से ही हुआ है। जब भी वह लोग हमारे पास शहर आते हैं तो प्रभात उस वक्त बहुत खुश होते हैं लेकिन वह मुझे कभी अच्छे से समय ही नहीं दे पाते और ना ही मेरे साथ वह कभी समय बिताते हैं। कई बार मुझे लगता है कि प्रभात सिर्फ मेरे साथ अपना समय बिता रहे हैं उनका मुझे लेकर कुछ फर्ज है लेकिन वह कभी अपने फर्ज को निभाते नहीं है और सिर्फ हमारे रिश्ते की खानापूर्ति करते हैं। एक दिन प्रभात अपने ऑफिस से जल्दी लौट आए वह मुझे कहने लगे सोनिया मैंने ऑफिस से एक हफ्ते की छुट्टी ले ली है मैं सोच रहा हूं कि कुछ दिनों के लिए हम लोग गांव हो आए। मेरा सबसे पहला सवाल प्रभात से यही था कि हम लोग गांव जाकर क्या करेंगे लेकिन प्रभात कहने लगे हम लोग गांव चलते हैं तुम्हें भी अच्छा लगेगा काफी समय से हम लोग कहीं गए नहीं है। मैं मन ही मन सोचने लगी प्रभात मुझसे कहते हम लोग कहीं पहाडो पर घूमने के लिए चलते हैं तो मुझे अच्छा लगता लेकिन वह तो मुझे अपने गांव लेकर जाना चाहते हैं। मैंने प्रभात कि बात को मना तो नहीं कर सकती थी मैंने सामान बांधना शुरू कर दिया।

मैंने प्रभात से पूछा तुम्हारी कितनी शर्ट रखनी है तो वह कहने लगे तुम अपने हिसाब से देख लो तुम्हें जैसा उचित लगता है वैसा तुम करो। मैंने कहा ठीक है मैं रख देती हूं हम लोग अगली सुबह गांव के लिए निकल पड़े हम लोग रोडवेज की बस से गांव गए क्योंकि गांव की दूरी दिल्ली से करीब 300 किलोमीटर है हालांकि मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था क्योंकि मैं प्रभात के माता पिता को बिल्कुल पसंद नहीं करती हूं और वह भी मुझे बिल्कुल पसंद नहीं करते है। मुझे बिल्कुल सही नहीं लग रहा था लेकिन फिर भी मेरी मजबूरी थी जो मुझे जाना पड़ा हम लोग जब गांव पहुंच गए तो गांव में सन्नाटा पसरा हुआ था शायद उस दिन गांव में किसी की मृत्यु हुई थी। हम लोग जब गांव में अपने पुश्तैनी घर में पहुंचे तो वहां पर प्रभात के माता-पिता हमारा इंतजार कर रहे थे। वह हमें कहने लगे तुम्हारा सफर कैसा रहा उनके सवाल का जवाब देते हुए मैंने कहा हमारा सफर तो अच्छा रहा। प्रभात अपने माता पिता से बात करने लगे मेरी सासू मां ने मुझे कहा सोनिया बेटा तुम चाय बना लाओ। मैं चाय बनाने के लिए रसोई में चली गई जब मैं चाय बनाने के लिए गई तो प्रभात और उनके माता पिता आपस में बैठकर बात कर रहे थे तभी बाहर से किसी ने आवाज लगाई।

मैं रसोई में थी तो मुझे मालूम नहीं पड़ा बाहर कौन है लेकिन जब मैं बाहर आई तो मैंने देखा गांव के ही एक चाचा हैं और वह प्रभात से मिलने के लिए आए हुए हैं। प्रभात से वह काफी वर्षों बाद मिल रहे थे तो उनकी उत्सुकता देखते ही बनती थी वह प्रभात से काफी देर तक बात करते रहे और प्रभात के बारे में पूछते रहे। मैं जब चाय लेकर आई तो मैंने उन चाचा जी को भी चाय दी वह मेरी तरह बड़े ध्यान से देख रहे थे। उन्होंने मुझसे पूछा बहू सब कुछ ठीक तो है ना? मैंने उन्हें जवाब देते हुए कहा हां चाचा जी सब कुछ ठीक है लेकिन उनकी नजरे मुझे कुछ ठीक नहीं लग रही थी वह मेरी तरफ बहुत ज्यादा घूर कर देख रहे थे। उनकी नज़रों में मुझे हवस दिखाई दे रही थी चाचा जी जब घर से गए तो मुझे ऐसा लगा जैसे कि चाचा जी ही मेरी बुझी हुई प्यास को पूरा कर सकते हैं क्योंकि प्रभात तो कभी भी मेरी तरफ अच्छे से देखते तक नहीं है। मैं इस बात से संतुष्ट थी गांव आकर कुछ तो अच्छा हुआ चाचा जी मुझ पर पूरी तरीके से डोरे डाल रहे थे। वह अगले दिन भी घर पर आ गए वह जब भी मुझे देखते तो मुझे बड़ा अच्छा लगता। वह जिस प्रकार से मुझे देख रहे थे उनकी नजरों में एक अलग ही बात थी और मैं भी उन्हें देखकर बहुत खुश होती। मैंने अपने बदन के हर एक हिस्से को उन्हें सौंपने के बारे में सोच लिया था एक रोज मुझे मौका मिल गया। मेरी सासू मां ने मुझे चाचा जी के पास भेजा और कहा बेटा जरा उनके घर से कुछ सामान ले आना। मैं उनके घर पर चली गई चाचा जी घर पर अकेले थे वह अपने बदन पर तेल की मालिश कर रहे थे। मैंने जब चाचा जी को देखा तो उनकी छाती के बाल और उनकी मर्दानगी देखकर मै उनकी तरफ पूरी फिदा हो गई। मैं उन्हें देख रही उन्हें देख कर मुझे बड़ा अच्छा लगता वह मुझे अपने पास बुलाते हुए कहने लगे बहू आओ तुम बैठो ना। उन्होंने मुझे बैठा दिया वह अपने कुर्ते को पहनते हुए बाहर आए। मैंने उन्हें कहा चाचा जी आप तो अब भी बड़े जवान लगते हैं।

चाचा जी कहने लगे मैं अभी पहलवानी करता हूं मुझे पहलवानी का बड़ा शौक है। चाचा जी भी समझ चुके थे कि मैं उनसे क्या चाहती हूं उन्होंने मेरी जांघ को सहलाना शुरु किया और मेरे बदन को गरम करने लगे मेरे शरीर से गर्मी बाहर निकलने लगी तो चाचा जी ने मुझे अपनी बाहों में ले लिया। कुछ क्षणों बाद उन्होंने मुझे अपनी गोद में बैठा दिया। जब उन्होने मुझे गोद में बैठाया तो उनका लंड मेरी गांड से टकराने लगा मुझे बड़ा अच्छा लगने लगा था मैंने चाचा जी के कुर्ते से अंदर हाथ डाला और उनकी छाती को सहलाने लगी। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कि आज चाचा जी मेरी इच्छा पूरी कर के रहेंगे। उन्होंने भी मेरे बदन से मेरे कपड़ों को उतारना शुरू किया मेरे बदन में जब एक भी कपड़ा नहीं था तो उन्होंने मुझे कहा बहू तुम लाजवाब हो तुम्हारा हुस्न किसी परी से कम नहीं है। यह कहते हुए उन्होंने मेरे स्तनों का रसपान करना शुरू किया वह मेरे स्तनों का रसपान ऐसे कर रहे थे जैसे कि काफी समय बाद उन्हें कोई जवान और टाइट माल मिला हो।

उन्होंने मेरे स्तनों का रसपान काफी देर तक किया और मेरे दूध को बाहर निकाल कर रख दिया। मैं पूरी तरीके से उत्तेजित हो चुकी थी मेरी उत्तेजना पूरे चरम सीमा पर पहुंच चुकी थी। चाचा जी ने भी अपने काले और मोटा लंड को बाहर निकाला तो मैंने उसे मुंह में लेकर चूसना शुरू किया। मै उनके लंड को काफी देर तक अपने मुंह में लेकर सकिंग करती रही काफी समय बाद मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। जैसे ही चाचा जी ने अपने मोटे लंड को मेरी योनि पर सटाया तो मेरी योनि से पानी बाहर की तरफ निकलने लगा। उन्होंने मुझे धक्का देते हुए कहा बहू तुम्हारी चूत तो बड़ी टाइट है। मैंने उन्हें कहा चाचा जी आप मेरी चूत को ढीला कर दीजिए ना यह सुनते ही उन्होंने मुझे अपनी पूरी ताकत के साथ चोदना शुरू किया। चाचा ने मेरे दोनों पैरों को अपने कंधों पर रखते हुए मेरी योनि के मजे लेने लगे मेरी योनि से पानी लगातार बाहर की तरफ बह रहा था और मुझे बड़ा आनंद आ रहा था। काफी देर तक हम दोनों के बीच ऐसा ही चलता रहा लेकिन जब चाचा जी ने अपने वीर्य की पिचकारी से मुझे नहला दिया तो मेरे इतने बरसों की इच्छा पूरी हो गई थी चाचा जी भी खुश हो गए थे।


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