चरित्रहीन बहू का कोठा

Charitraheen bahu ka kotha:

Antarvasna, hindi sex kahani मैं जब शादी कर के माधव के घर पर आई तो उस वक्त मेरी उम्र महज 21 वर्ष की थी और 21 वर्ष की छोटी सी उमर में मेरे ऊपर घर की सारी जिम्मेदारियां आ गयी। घर में माधव बड़े थे माधव की उम्र उस वक्त 25 वर्ष रही होगी लेकिन उनके ऊपर काफी जिम्मेदारी थी। हम लोग एक छोटे से कस्बे में रहा करते थे वहां पर हमारे चार कमरों का छोटा सा घर था सब कुछ बड़ी जल्दी होता चला गया। मेरी शादी के कुछ ही समय बाद मेरी लड़की शोभा का जन्म हुआ उसके कुछ अंतराल के बाद ही मेरे लड़के रंजीत का जन्म हुआ रंजीत और शोभा को हमने बहुत अच्छी परवरिश दी। मैंने और माधव ने कभी भी रंजीत और शोभा में कोई अंतर नहीं समझा हालांकि उस वक्त हमारे आस-पड़ोस का माहौल कुछ ठीक नहीं था। सब लोग लड़कियों में बहुत भेदभाव किया करते थे लेकिन उसके बावजूद भी हमने कभी शोभा और रंजीत में कोई भेदभाव नहीं किया।

एक बार हमारे घर पर ना जाने किसकी नजर लगी हमारे घर में एक दिन आग लग गई और आस-पड़ोस के सब लोग घबरा गए जिससे जितना बन सकता था उतना सब लोगों ने मदद करने की कोशिश की लेकिन उसके बावजूद भी हमारा घर पूरी तरीके से बर्बाद हो चुका था। मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करना चाहिए और माधव भी बहुत परेशानी में थे। शोभा और रंजीत की उम्र उस वक्त ज्यादा नहीं थी इसलिए वह दोनों इस बात से अनजान थे। हम लोगों को अपने एक दोस्त के घर पर शरण लेनी पड़ी और हम लोग वहीं कुछ समय तक रहे लेकिन मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा तो मैंने एक दिन माधव से कहा की हम लोग कब तक किसी के घर में ऐसे रहेंगे अब तुम ही बताओ। माधव के दोनों छोटे भाइयों की जिम्मेदारी भी माधव के कंधों पर ही थी माधव ने ठान लिया था कि अब वह कुछ कर के ही रहेंगे। वह हमें लेकर इलाहाबाद चले आए इलाहाबाद की गलियों में हमने एक छोटा सा घर किराए पर लिया और उस वक्त हमारे पास खाने तक के पैसे नहीं थे लेकिन माधव जैसे तैसे खाने का बंदोबस्त कर ही दिया करते थे। अब उनके दोनों भाइयों को भी एहसास होने लगा था कि उन्हें भी कुछ करना चाहिए इसीलिए वह भी काम पर जाने लगे। काम अच्छे से चलने लगा था और धीरे-धीरे करके स्थिति में थोड़ा बहुत सुधार होने लगा लेकिन अब भी इतना कुछ ठीक नहीं हो पाया था।

माधव बहुत ही मेहनती है उन्होंने मेहनत कर के एक छोटी सी दुकान ले ली माधव बहुत मेहनत कर रहे थे क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि शोभा और रंजीत को किसी भी प्रकार की कोई मुसीबत हो। धीरे धीरे अब उनकी मेहनत का फल उन्हें मिलने लगा और हमने भी अपना एक छोटा सा घर खरीद लिया। कुछ समय तक तो मेरे दोनों देवर हमारे साथ ही रहे लेकिन उसके बाद उन दोनों को भी माधव ने अपनी जान पहचान के चलते किसी अच्छी जगह पर काम पर लगवा दिया और वह लोग भी अब अपने पैरों पर खड़े हो चुके थे। हमारे दो कमरों के घर में अब ज्यादा जगह नहीं थी इसलिए मेरे दोनों देवर अलग रहने लगे थे। वह दोनों पूरी मेहनत के साथ काम करते उन्होंने भी धीरे धीरे अपने पैरों पर खड़ा होना सीख लिया और वह भी अब अच्छा कमाने लगे थे। शोभा और रंजीत को हमने इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाया ताकि उन लोगों की पढ़ाई में कोई कमी ना रह सके। हम दोनों ही ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन उसके बावजूद भी हमने अपने दोनों बच्चों को अच्छे स्कूल में शिक्षा दी और वह दोनों अब पढ़ने में अच्छे होने लगे थे। उन दोनों की टीचर बड़ी तारीफ किया करते थे वह कहते थे कि आपके बच्चे पढ़ने में बहुत अच्छे हैं। समय बीतता चला गया और धीरे-धीरे मेरे चेहरे पर झुर्रियां पड़ने लगी और बाल भी सफेद होने लगे माधव भी अब बूढ़े होने लगे थे। हमारी उम्र 60 वर्ष के आस पास की हो चुकी थी शोभा की शादी भी हम लोगों ने करवा दी थी और रंजीत की भी शादी हो चुकी थी। हम दोनों ने अपने बच्चों को कोई भी कमी नहीं होने दी लेकिन ना जाने हमारी परवरिश में कहां कमी रह गई थी।

रंजीत की पत्नी सुधा नेचर की बिल्कुल भी अच्छी नहीं थी उसका व्यवहार हम लोगों के साथ बिल्कुल अच्छा नहीं रहता था जिस वजह से कई बार मेरे और सुधा के बीच में मन मुटाव हो जाता था। रंजीत अपने काम के सिलसिले में बाहर ही रहा करता था उसे सब कुछ मालूम है कि कैसे हमने उसकी और शोभा की परवरिश में कोई कमी नहीं रहने दी। रंजीत इस बात को भली-भांति जानता था परंतु सुधा को शायद इस बात का कोई अंदाजा नहीं था कि हम लोगों ने अपने जीवन में कितनी मेहनत की है। सुधा एक बड़े घर की लड़की थी उसे तो सब कुछ थाली में परोसा हुआ मिल चुका था इसलिए उसे इस बात का कोई अंदाजा नहीं था की हम लोगों ने कितनी मेहनत की है। माधव तो अपने जीवन में हमेशा ही मेहनत करते रहे जिस वजह से उनकी तबीयत भी खराब रहने लगी थी मुझे भी कई बार लगता कि कहीं माधव की तबीयत ज्यादा खराब ना हो जाए। मैंने एक दिन रंजीत से कहा रंजीत बेटा आजकल तुम्हारे पापा की तबीयत कुछ ठीक नहीं रहती है मैं सोच रही थी कि हम लोग कहीं घूम आते हैं। रंजीत कहने लगा हां मम्मी आप लोग कहीं घूम आओ इस बीच आपको अच्छा भी लगेगा और आप लोग कहीं घूमने चले जाओगे तो आप लोगों का समय भी कट जाएगा।

माधवा दुकान पर बहुत कम जाया करते थे क्योंकि उनकी तबीयत ठीक नहीं रहती थी इसलिए वह ज्यादा देर तक दुकान में नहीं बैठे रह सकते थे। मैंने और माधव ने इतने लंबे समय बाद कहीं घूमने का विचार अपने मन में लाये थे तो हम लोग घूमने के लिए इंदौर चले गए। इंदौर में मेरी बुआ की लड़की रहती है वह काफी बार हमें कहती थी कि आप लोग हमारे पास घूमने के लिए आइए ना तो मैंने सोचा कि इंदौर ही घूम आते हैं। हम दोनों इंदौर चले गए हम लोग काफी दिनों तक इंदौर में रहे और हमें अच्छा भी लगा क्योंकि माहौल के बदलने से थोड़ा तरो ताजगी हम दोनों महसूस कर रहे थे और हमें बहुत अच्छा लग रहा था। मैं और माधव सोच रहे थे कि हम दोनों अपने बुढ़ापे में कैसे अपना जीवन व्यतीत करेंगे क्योंकि सुधा के ऊपर तो मुझे बिल्कुल भी भरोसा नहीं था। रंजीत भी अब अपने काम में व्यस्त रहता था इसलिए वह हमें समय नहीं दे पाता था। मुझे हमेशा ही चिंता सताती रहती थी कि कहीं रंजीत भी हमें छोड़कर ना चला जाए और हमारे बुढ़ापे का सहारा हमसे छिन जाए हम दोनों बहुत चिंतित रहने लगे थे। माधव ने मुझे कहा कोई बात नहीं सुनीता तुम चिंता मत करो सब कुछ ठीक हो जाएगा तुम मुझ पर भरोसा रखो। मुझे लगता है कि मुझे माधव पर भरोसा करना चाहिए और सब कुछ ठीक हो जाएगा। मुझे कहां मालूम था कुछ भी ठीक होने वाला नहीं है मेरी बहू सुधा की वजह से घर में दिन-रात झगड़े होने लगे थे। रंजीत भी सुधा के आगे बेबस था वह भी कुछ कह नहीं पा रहा था मैं रंजीत की बेबसी को समझती थी कि आखिरकार वह क्यों सुधा के सामने कुछ नहीं कह पा रहा है। हद तो तब हो गई जब सुधा ने अपने असली रंग दिखाना शुरू कर दिया वह मुझे कहने लगी मां जी मेरे दोस्त मुझसे मिलने के लिए आ रहे हैं ।मैं जब उसके दोस्तों से मिली तो मुझे उनके हाव-भाव कुछ ठीक नहीं लगे मैंने आखिरकार इस बारे में सुधा से पूछ लिया मुझे तुम्हारे दोस्त कुछ ठीक नहीं लगे लेकिन सुधा को तो जैसे सिर्फ झगडे करने का बहाना चाहिए था।

वह रंजीत के सामने मुझे गलत ठहराने लगी और कहने लगी आप तो मुझ पर शक करती हैं रंजीत की आंखों पर अपनी पत्नी का बुना हुआ जाल था वह सिर्फ और सिर्फ अपनी पत्नी पर ही भरोसा किया करता। मुझे सब कुछ साफ साफ दिखाई दे रहा था सुधा से मिलने के लिए घर में ही उसके दोस्त आने लगे थे। एक दिन सुधा बहुत खुश नजर आ रही थी मुझे मालूम नहीं था कि उसकी खुशी का क्या कारण है लेकिन जब उस दिन उसका दोस्त उससे मिलने के लिए आया तो सुधा ने उसके सामने अपने सारे कपड़े खोल दिए। मैं यह सब छोटी सी खिड़की से देख रही थी सुधा ने जब अपने अंतर्वस्त्रों को भी उसके सामने खोलकर रख दिया तो मैं पूरी तरीके से डर गई थी आखिरकार सुधा को क्या हो गया है। सुधा तो एक निहायती गिरी हुई महिला है सुधा ने जब उसके लंड को अपने मुंह में लेकर सकिंग करना शुरू किया तो मैं सिर्फ देखती रह गई। अब मेरी उम्र भी हो चुकी है इसलिए मैं किसी को कुछ नहीं कह सकती थी। रंजीत तो मुझ पर वैसे ही भरोसा नहीं करता था और माधव की तबीयत भी ठीक नहीं रहती थी। सुधा अपने दोस्त के लंड को ऐसे चूस रही थी जैसे की ना जाने कबसे भूखी बैठी हुई हो।

मुझे भी अपनी जवानी के दिन याद आ गए माधव और मै एक दूसरे के साथ जमकर सेक्स का लुफ्त उठाया करते थे। जब उस नौजवान युवक ने अपने मोटे से लिंग को सुधा की योनि के अंदर प्रवेश करवाया तो वह चिल्लाने लगी। उसका लंड उसकी योनि के अंदर तक समा चुका था वह पूरी तरीके से उत्तेजित हो चुकी थी और उन दोनों के अंदर गर्मी लगातार बढ़ती जा रही थी। मैं यह सब देखे जा रही थी लेकिन मैं बेबस थी मैं कुछ भी नहीं कर सकती थी। वह उसे उठा उठा कर चोदे जा रहा था सुधा अपने मुंह से जो मादक आवाज लेती वह कमरे के बाहर भी आने लगी थी। मैं यहां सब देखती ही रह गई लेकिन मैं कुछ कर न सकी और ना ही सुधा को कुछ कह सकी। जब उस नौजवान युवक ने अपने वीर्य की पिचकारी से सुधा को नहला दिया तो सुधा पूरी तरीके से उसकी ही हो चुकी थी। वह सिर्फ और सिर्फ उसके लंड को अपने मुंह में लेकर सकिंग कर रही थी जिसे कि उसने चूस चूस कर पूरा साफ कर दिया था और उसके माल को पूरा चाट लिया था। अब भी वह युवक आता है और सुधा की चूत मारकर चला जाता है।


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